उत्तराखण्ड

सीएम धामी ने एनडी तिवारी की तरह विपक्ष की बजाए अपनी ही पार्टी के विधायक की सीट खालीकर कराकर राजनीतिक मूल्याें का किया पालन

आखिरकार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सीट को लेकर अटकल थम गईं। चंपावत से भाजपा विधायक कैलाश गहतोड़ी ने विधानसभा से इस्तीफा देकर मुख्यमंत्री के लिए उपचुनाव का रास्ता साफ कर दिया है। इस सियासी घटनाक्रम के बाद मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस राहत महसूस कर रही है।

गुटबाजी व असंतोष से घिरी कांग्रेस इस आशंका से परेशान थी कि कोई कांग्रेस का विधायक इस्तीफा देकर भाजपा के पाले में न चला जाए। इन सब सियासी अटकलों को निराधार साबित कर मुख्यमंत्री धामी ने राज्य की सियासत में वैचारिक व सिद्धांतवादी सियासत को आगे बढ़ाकर नई उम्मीद जगाई है।

राज्य में 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता में आई तो तबके सांसद व दिग्गज नेता एनडी तिवारी को मुख्यमंत्री बनाया गया। एनडी ने लोकसभा से इस्तीफा दिया। तब रामनगर से कांग्रेस विधायक वाईएस रावत ने तिवारी के लिए इस्तीफा देकर सीट खाली की।

2007 में भाजपा सत्ता में आई तो तब के गढ़वाल सांसद भुवन चंद्र खंडूरी को मुख्यमंत्री बनाया गया। फिर खंडूरी के लिए पौड़ी गढ़वाल जिले की धुमाकोट कांग्रेस विधायक व तिवारी राज में आबकारी मंत्री रहे टीपीएस रावत ने इस्तीफा देकर सीट खाली की। नए परिसीमन में यह सीट खत्म हो गई थी।

2012 में कांग्रेस फिर सत्ता में आई तो विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री बने और उनके लिए सीट छोड़ी सितारगंज के तत्कालीन भाजपा विधायक किरन मंडल ने। मंडल को फिर कुमाऊं मंडल विकास निगम का अध्यक्ष बनाया गया था। खंडूरी व बहुगुणा के लिए विपक्षी दलों के सीट खाली करने पर खरीद फरोख्त के आरोप भी लगे थे। बहुगुणा के बाद हरीश रावत मुख्यमंत्री बने तो उनके लिए धारचूला के कांग्रेस विधायक हरीश धामी ने सीट छोड़ी थी। धामी को वन विकास निगम अध्यक्ष बनाया गया था।

नियमानुसार मुख्यमंत्री को छह माह के भीतर विधानसभा सदस्य बनना जरूरी है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने तो उम्मीद जताई थी कि धामी विपक्षी दलों में सेंधमारी के बजाय अपने दल विधायक से सीट रिक्त कराएं। बहरहाल मुख्यमंत्री धामी ने भाजपा विधायक से सीट रिक्त कराकर राज्य में दलबदल की राजनीति पर धीरे से मगर बड़ा प्रहार किया है। इसके दूरगामी परिणाम भविष्य में दिखाई दे सकते हैं।

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