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उत्तराखण्ड के माता पार्वती की किस जिद से भोलेनाथ यह स्‍थान नही छोडते

उत्तराखण्ड के माता पार्वती की किस जिद से भोलेनाथ यह स्‍थान नही छोडते

माता पार्वती की किस जिद से भोलेनाथ यह स्‍थान नही छोडते

संसार में प्रथम पूज्य घोषित करने को लेकर भगवान शंकर ने कहा था कि जो देवता पृथ्वी का एक चक्कर सबसे पहले पूरा करेगा, वह संसार में प्रथम पूज्य कहलाएगा। भगवान कार्तिकेय समेत अन्य देवता पृथ्वी का चक्कर लगाने निकल पड़े। भगवान गणेश ने अपने माता-पिता का चक्कर लगाया। जिसके बाद सभी देवताओं ने निर्णय लिया कि माता- पिता से बढ़कर तीनों लोकों में कोई बड़ा नहीं है। इसलिए भगवान गणेश को प्रथम पूज्य घोषित कर दिया गया। जिससे उनके बड़े भाई कार्तिकेय नाराज हो गए।

अत्यन्त क्र ोधित होकर कार्तिकेय जी ने अपना खाल व मांस उतार कर माता के चरणों में रख दिया और समस्त नारी जाति को श्राप दिया कि मेरे इस स्वरूप के जो स्त्री दर्शन करेगी, वह सात जन्म तक विधवा रहेगी , तभी देवताओं ने उनके शारीरिक शांति के लिए तेल व सिन्दूर का अभिषेक कराया जिससे उनका क्रोध शांत हुआ और शंकर जी व अन्य देवताओं ने कार्तिकेय जी को समस्त देव सेना का सेनापति बना दिया। 

उन्होंने अपना पूरा मांस काटकर माता-पिता के सम्मुख फेंक दिया और हड्डियों के ढांचे समेत क्रौंच पर्वत पर चले गए। जिसके बाद वह वापस नहीं गए। क्रौंच पर्वत पर भगवान कार्तिकेय की पूजा निर्वाण रूप में होती है। जो सदियों से होती चली आ रही है। माता-पिता से अलग होकर कार्तिक क्रौंच पर्वत पर रहने लगे। शिव और पार्वती ने अपने पुत्र कार्तिकेय को समझा-बुझाकर बुलाने हेतु देवर्षि नारद को क्रौंचपर्वत पर भेजा। देवर्षि नारद ने बहुत प्रकार से स्वामी को मनाने का प्रयास किया, किन्तु वे वापस नहीं आये। उसके बाद कोमल हृदय माता पार्वती पुत्र स्नेह में व्याकुल हो उठीं। वे भगवान शिव जी को लेकर क्रौंच पर्वत पर पहुँच गईं। इधर स्वामी कार्तिकेय को क्रौंच पर्वत अपने माता-पिता के आगमन की सूचना मिल गई और वे वहाँ से तीन योजन अर्थात छत्तीस किलोमीटर दूर चले गये। कार्तिकेय के चले जाने पर भगवान शिव उस क्रौंच पर्वत पर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो गये तभी से वे ‘मल्लिकार्जुन’ ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुए। ‘मल्लिका’ माता पार्वती का नाम है, जबकि ‘अर्जुन’ भगवान शंकर को कहा जाता है। इस प्रकार सम्मिलित रूप से ‘मल्लिकार्जुन’ नाम उक्त ज्योतिर्लिंग का जगत में प्रसिद्ध हुआ।

क्रौंच नामक एक पर्वत का उल्लेख पौराणिक महाकाव्य महाभारत में हुआ है। महाभारत के अनुसार यह कैलास पर्वत का ही एक भाग था, जिस पर मानसरोवर स्थित है। यह पर्वत हिमालय का एक भाग है। पौराणिक कथा से ज्ञात होता है कि परशुराम ने धनुर्विद्या समाप्त करने के पश्चात हिमालय में बाण मारकर आर-पार मार्ग बना दिया था। इस मार्ग से ही मानसरोवर से दक्षिण की ओर आने वाले हंस गुजरते थे। इस मार्ग को ‘क्रौंच रंध्र’ कहते थे। वाल्मीकि रामायण, किष्किंधाकांड[2] में वानर राज सुग्रीव ने सीता के अन्वेषणार्थ वानर सेना को उत्तर की ओर भेजते हुए तत्स्थानीय अनेक प्रदेशों का वर्णन करते हुए कैलाश से कुछ दूर उत्तर की ओर स्थित ‘क्रौंचगिरि’ का उल्लेख किया है-

‘क्रौंचं तु गिरिमासाद्य बिलं तस्य सुदुर्गमम्, अप्रमत्तै: प्रवेष्टव्यं दुप्प्रवेशं हि तत्स्मृंतम्’
अर्थात “क्रौंच पर्वत पर जाकर उसके दुर्गम बिल पर पहुँच कर उसमें बड़ी सावधानी से प्रवेश करना, क्योंकि यह मार्ग बड़ा दुस्तर है।” 
‘पुन: क्रौंचस्य तु गुहाश्चान्या: सानूनि शिखराणि च, दर्दराश्च नितंबाश्च विचेतव्यास्ततस्त:।'[3]
अर्थात “क्रौंच पर्वत की दूसरी गुहाओं को तथा शिखरों और उपत्यकाओं को भी अच्छी तरह खोजना। क्रौंचगिरि के आगे मैनाक का उल्लेख है-
‘क्रौंचं गिरिमतिक्रम्य मैनाको नाम पर्वत:।'[4]
• ‘मेघदूत'[5] में भी क्रौंच रंध्र का सुंदर वर्णन है-
‘प्रालेयाद्रेरुपतट मतिक्रम्यतां स्तान् विशेषान् हंसद्वारं भृगुपति यशोवस्मै यत्क्रौंचरन्ध्रम्।’
अर्थात “हिमालय के तट में क्रौच रंध्र नामक घाटी है, जिसमें होकर हंस आते-जाते हैं; वहीं परशुराम के यश का मार्ग है।
• इसके अगले छन्द 30 में कैलाश का वर्णन है। इस प्रकार वाल्मीकि और महाकवि कालिदास दोनों ने ही क्रौंच पर्वत तथा क्रौंच रंध्र का उल्लेख कैलाश के निकट किया है। अन्यत्र भी ‘कैलासे धनदावासे क्रौंच: क्रौंचोऽभिधीयते’ कहा गया है। कालिदास ने क्रौंच रंध्र से संबंधित कथा का ‘रघुवंश'[6] में भी निर्देश किया है-
‘विभ्रतोस्त्रमचलेऽप्यकुंठितम्’
अर्थात “मेरे (परशुराम) अस्त्र या बाण को पर्वत (क्रौंच) भी न रोक सका था।
• वास्तव में क्रौंच रंध्र दुस्तर हिमालय पर्वत के मध्य और मानसरोवर-कैलाश के पास कोई गिरिद्वार है, जिसका वर्णन प्राचीन साहित्य में काव्यात्मक ढंग से किया गया है। हंस और क्रौंच या कुंज आदि हिमालय के पक्षी जाड़ों मंर हिमालय की निचली घाटियों को पार करके ही आगे दक्षिण की ओर आते हैं। श्री वासुदेव शरण अग्रवाल के अनुसार यह अल्मोड़ा के आगे ‘लीपूलेक’ का दर्रा है।[7]

हिन्दु धर्म में विष्णु पुराण के अनुसार पृथ्वी का वर्णन इस प्रकार है। यह वर्णन श्रीपाराशर जी ने श्री मैत्रेय ऋषि से कियी था। उनके अनुसार इसका वर्णन सौ वर्षों में भी नहीं हो सकता है। यह केवल अति संक्षेप वर्णन है। यह पृथ्वी सात द्वीपों में बंटी हुई है। वे द्वीप एस प्रकार से हैं:-
1. जम्बूद्वीप
2. प्लक्षद्वीप
3. शाल्मलद्वीप
4. कुशद्वीप
5. क्रौंचद्वीप
6. शाकद्वीप
7. पुष्करद्वीप
ये सातों द्वीप चारों ओर से क्रमशः खारे पानी, इक्षुरस, मदिरा, घृत, दधि, दुग्ध और मीठे जल के सात समुद्रों से घिरे हैं। ये सभी द्वीप एक के बाद एक दूसरे को घेरे हुए बने हैं और इन्हें घेरे हुए सातों समुद्र हैं। जम्बुद्वीप इन सब के मध्य में स्थित है।
इस द्वीप के स्वामि वीरवर द्युतिमान थे। इनके सात पुत्रों : कुशल, मन्दग, उष्ण, पीवर, अन्धकारक, मुनि और दुन्दुभि के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। घी का सागर अपने से दूने विस्तार वाले क्रौंच द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।
क्रौंच, वामन, अन्धकारक, घोड़ी के मुख समान रत्नमय स्वाहिनी पर्वत, दिवावृत, पुण्डरीकवान, महापर्वत दुन्दुभि नामक सात पर्वत हैं। गौरी, कुमुद्वती, सन्ध्या, रात्रि, मनिजवा, क्षांति और पुण्डरीका नामक सात नदियां हैं।
कुशल, मन्दग, उष्ण, पीवर, अन्धकारक, मुनि और दुन्दुभि। यहां पुष्कर, पुष्कल, धन्य और तिष्य नामक चार वर्ण हैं। यह द्वीप अपने ही बराबर के दधिमण्ड (मठ्ठे) से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है। यह सागर अपने से दुगुने विस्तार वाले शाक द्वीप से घिरा है।

:: :: ऐतिहासिक मन्दिर के दर्शनार्थ बड़े-बड़े राजा-महाराजा समय-समय पर आते रहे हैं

एक अन्य कथा के अनुसार कौंच पर्वत के समीप में ही चन्द्रगुप्त नामक किसी राजा की राजधानी थी। उनकी राजकन्या किसी संकट में उलझ गई थी। उस विपत्ति से बचने के लिए वह अपने पिता के राजमहल से भागकर पर्वतराज की शरण में पहुँच गई। वह कन्या ग्वालों के साथ कन्दमूल खाती और दूध पीती थी। इस प्रकार उसका जीवन-निर्वाह उस पर्वत पर होने लगा। उस कन्या के पास एक श्यामा (काली) गौ थी, जिसकी सेवा वह स्वयं करती थी। उस गौ के साथ विचित्र घटना घटित होने लगी। कोई व्यक्ति छिपकर प्रतिदिन उस श्यामा का दूध निकाल लेता था। एक दिन उस कन्या ने किसी चोर को श्यामा का दूध दुहते हुए देख लिया, तब वह क्रोध में आगबबूला हो उसको मारने के लिए दौड़ पड़ी। जब वह गौ के समीप पहुँची, तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, क्योंकि वहाँ उसे एक शिवलिंग के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं दिया। आगे चलकर उस राजकुमारी ने उस शिवलिंग के ऊपर एक सुन्दर सा मन्दिर बनवा दिया। वही प्राचीन शिवलिंग आज ‘मल्लिकार्जुन’ ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध है। इस मन्दिर का भलीभाँति सर्वेक्षण करने के बाद पुरातत्त्ववेत्ताओं ने ऐसा अनुमान किया है कि इसका निर्माणकार्य लगभग दो हज़ार वर्ष प्राचीन है। इस ऐतिहासिक मन्दिर के दर्शनार्थ बड़े-बड़े राजा-महाराजा समय-समय पर आते रहे हैं।

 

उत्तराखंड को देवभूमि शायद इसी लिए कहते हैं क्योंकि यहां स्थित क्रांच पर्वत पर हमारे सभी देवता पाषाण रूप अर्थात तपस्यारत वह भी एक साभ है और उनकी तपस्या सदियों से चली आ रही है। यह भी कारण हो सकता है कि इस पर्वत के बारे में दूनिया आजदिन तक नहीं जान पायी और आज भी इस स्थान के बारे में स्थानीय लोगों के अतिरिक्त कम ही लोग जानते हैं। आज हम आपको इसी महान तीर्थ के बारे में विस्तार से बता रहे है।
उल्लेखनीय है कि तपोभूमि उत्तराखण्ड अनादिकाल से ही साधना और आस्था का केन्द्र रहा है। उत्तराखण्ड के तीर्थ स्थल जहां धार्मिक गाथाओं और भावनाओं से ओत-प्रोत है, वहीं प्राकृतिक दृश्यावलियों से भी अवेष्ठित हैं। देवताओं की रमण स्थली होने के कारण प्राचीन काल से ही यहां तीर्थाटन की परम्परा है। उस परम्परा मंद प्रति वर्ष लाखों श्रद्धालु देवभूमि उत्तराखण्ड में आते हैं। वास्तव में विगत कई दशकों से आवागमन की सुलभता, विज्ञान की उपलब्धि एंव उपयोग का मानव मस्तिष्क व मन पर प्रभाव होना स्वाभाविक है।

परिणाम स्वरुप मानव की सोच, व्यवहार, आहार व शरीर के कष्ट से पूरे रहने की प्रवृत्ति को जन्म मिला है।तीर्थाटन की भावना से व्यक्ति मीलों व महीनों पैदल चलता था, सात्विक भोजन व कम से कम सामग्री का उपयोग करता था जिससें स्वस्थ मनोभाव, हृदय की पवित्रता एंव दूसरों के प्रति श्रद्वा-प्रेम उत्पन्न होता था। वहीं पर्यटन में वैभव-प्रदर्शन एंव बिना शारीरिक कष्ट के भ्रमण के आनन्द की परिकल्पना समाहित है। यह परिकल्पना भारत के चारों धामों व विकट कहे जाने वाले तीर्थों में भी यात्रियों में परिलक्षित होती है।

क्योंकि साधन सुलभ होने के साथ ही नवीनतम सुविधाओं की उपलब्धता लगातार बढ़़़ रही है। वर्तमान में तीर्थाटन की जो परम्परा यहां पहुंचते हैं। किन्तु कुछ ही तीर्थ स्थानों की यात्रा कर वे सम्पूर्ण देवभूमि घूमने का सुन्दर सपना लिए ही वापस लौट जाते है।उत्तराखण्ड में आज भी कई महत्वपूर्ण सिद्ध पीठ बिना प्रचार-प्रसार के उपेक्षित पड़े हुए हैं।इसी श्रंृखला में क्रौंच पवर्त पर तपस्यारत देवाधिदेव महादेव के ज्येष्ठ पुत्र भगवान कार्तिक स्वामी तीर्थ अपनी महत्ता एंव प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण होते हुए भी असंख्य श्रद्धालुओं एंव प्रकृति प्रेमियों के लिए अनजान बना हुआ है।
प्रस्तुति “हिमालयायूके” डिजिटल मीडिया
उत्तराखण्ड में हरिद्वार से 162 किमी मोटर मार्ग पर जनपद मुख्यालय रुद्रप्रयाग है। रुद्रप्रयाग से नरेन्द्र सिंह भण्डारी रुद्रप्रयाग पोखरी-हापला-गोपेश्वर मोटर मार्ग पर 36 कि0मी0 की दूरी पर समुद्रतल से 8530 फुट की ऊँचाई पर अवस्थित क्रौच पवर्त पर भगवान कार्तिक स्वामी अपनी सुन्दर ध्वजा-पताकाओं एंव घण्टा-घडिय़ालों के साथ विराजमान है। उच्च स्तरीय स्थापत्य कला के मन्दिर समूहों को समेटे कार्तिक स्वामी तीर्थ आस्था और विश्वास का प्रतीक बन कर भक्तों-श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन कर रहा है।

यात्री जैसे ही मोटर मार्ग पर स्थित कनकचौंरी से आगे पैदल चलता है तो सहसा प्राकृतिक सौन्दर्य का दृश्यावलोकन करते-करते भाव-विभोर हो जाता है। कनकचौंरी से क्रौंच पवर्त के दर्शन करने से ही आभास हो जाता है कि प्रकृति ने क्रौच पवर्त का निर्माण दैवीय शक्ति के दिग्दर्शन हेतु किया है। मोटर मार्ग से क्रौच पवर्त तक 4 कि0मी0 के पैदल रास्ते में दूर-दूर तक बांज-बुरांश, मोरु, थुनेर, अंयार, नैर एंव विभिन्न प्रकार की प्रजातियों के वृक्षों से सुसज्जित सघन वन अपूर्व छटा लिए श्रद्धालुओं को आल्हादित कर देता है।

3 किमी0 की दूरी तय करने पर आप स्कन्द नगरी में प्रवेश करेंगे तो नगरी में ही पूज्य स्व0 गुरु नर्मदा पुरी जी व स्व0 गोविन्द पुरी जी की समाधियां, नर्मदा कुण्ड, भण्डार, अखण्ड ज्योति, पुजारी की कुटिया व धर्मशालाओं के दर्शन हो जाते है।सर्दियों में अत्याधिक हिमपात होने से प्रभु दरबार तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। इसलिए अखण्ड ज्योति व धूनी स्कन्द नगरी में ही विराजमान हैं। स्कन्द नगरी से क्रौच पवर्त तक लगभग 750 मीटर तक फैली दूरी का हर पत्थर किसी न किसी आकृति में ढला हुआ देखा जा सकता है।

भगवान कार्तिक स्वामी के देव सेनापति होने के कारण 33 कोटि देवी-देवतओं क्रौंच पर्वत पर पाषाण रुप में निवास करते है। स्कन्द नगरी से कुछ दूरी तय करने पर क्रमश: गरुड़ भगवान, नन्दीश्वर, भैरव गुफा के दर्शन होते है। भैरवं गुफा को स्थानीय भाषा में कडा़गिरि का उड्यार कहा जाता है। क्योकिं कई दशकों पूर्व बाबा कडा़गिरि ने यहां पर घोर तपस्या की थी। कडा़गिरि उड्यार से अग्रसर होने पर वन देवता, ऐडी़-आछरियों के दर्शन होते है।

यहां पर महिलायें चूडी़, रिबन, माला, सिन्दुर, काजल, अगूंठी, चुनरी इत्यादि नाना प्रकार की सामाग्री चढ़ा कर शुभाशीष पाती है। वनदेवतओं के बगल में ही भैरव जी व माद्व षष्टी देवी के दर्शन होते है। वहां से ढांढिक के पातल में विराजमान भगवान विष्णु के दर्शन किये जा सकते है। इन मन्दिरों से आगे चढ़कर आपकों शेर व गजराज के दर्शन होते है। तथा भगवान कार्तिक स्वामी के भव्य व दिव्य मन्दिर, जिसका मुकुट हिमालय व ताज चौखम्भा है के दर्शन होते है।

प्रकृति का रसिक जब क्रौच पर्वत के शिखर पर पहुंच जाता है तो वहां से प्रकृति का जो नजारा सम्मुख दिखाई पड़ता है, वह एम मधुर स्मृति बन कर जीवन पर्यन्त उसके मानस-पटल पर बना रहता है। इस शान्त वातावरण में भटके मन को असीम अध्यात्मिक शान्ति मिलती है। पर्यटक जहां खड़ा होता है तो ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे वह उत्तराखण्ड के चारों धामों की यात्रा एक साथ इस पावन पवित्र देवभूमि क्रौंच पर्वत से कह रहा है। क्योंकि चारों तरफ गगनचुम्बी पर्वत श्रृखलायें हिम की श्वेत चादर ओढें हिमालय का खूबसूरत दृश्य तथा उत्तराखण्उ के एक बडें़ भाग के अद्भुत प्राकृतिक नजारे भी दिखाई पड़तें है।  क्रौच पर्वत के शिखर की सबसे मुख्य विशेषता यह है कि यहां से चौखम्भा, द्रौपती का डंाडा, मद्महेश्वर, बूढा, मद्महेश्वर, केदारनाथ, कौसानी, रुद्रनाथ बंदरपुंछ, मेरु-सुमेरु, नीलकंठ, पंचाचूली, त्रिशूल, नन्दादेवी, नन्दाघुंघटी, कामेट, दूनागिरि , हरियाली, आदि पर्वत शिखर व मन्दाकिनी, अलकन्दा व क्रौच पर्वत से निकलने वानीं पांच नदियों की सैकडा़ें फुट गहरी खाइयां, 80 प्रतिशत हिमालय व 90 प्रतिशत उत्तराखण्ड, दृष्टिगोचर होते है।

 

कार्तिकेय स्वामी सेनाधिप हैं, शक्ति के अधिदेव हैं, प्रतिष्ठा, विजय, व्यवस्था, अनुशासन सभी कुछ इनकी कृपा से सम्पन्न होते हैं। कृत्तिकाओं ने इन्हें अपना पुत्र बनाया था, इस कारण इन्हें ‘कार्तिकेय’ कहा गया, देवताओं ने इन्हें अपना सेनापतित्व प्रदान किया। मयूर पर आसीन देवसेनापति कुमार कार्तिक की आराधना दक्षिण भारत मे सबसे ज्यादा होती है, यहाँ पर यह ‘मुरुगन’ नाम से विख्यात हैं। स्कन्दपुराण के मूल उपदेष्टा कुमार कार्तिकेय ही हैं तथा यह पुराण सभी पुराणों में सबसे विशाल है।

माता का शाप

एक बार शंकर भगवान ने पार्वती के साथ जुआ खेलने की अभिलाषा प्रकट की। खेल में भगवान शंकर अपना सब कुछ हार गए। हारने के बाद भोलेनाथ अपनी लीला को रचते हुए पत्तो के वस्त्र पहनकर गंगा के तट पर चले गए। कार्तिकेय जी को जब सारी बात पता चली, तो वह माता पार्वती से समस्त वस्तुएँ वापस लेने आए। इस बार खेल में पार्वती हार गईं तथा कार्तिकेय शंकर जी का सारा सामान लेकर वापस चले गए। अब इधर पार्वती भी चिंतित हो गईं कि सारा सामान भी गया तथा पति भी दूर हो गए। पार्वती जी ने अपनी व्यथा अपने प्रिय पुत्र गणेश को बताई तो मातृ भक्त गणोश जी स्वयं खेल खेलने शंकर भगवान के पास पहुंचे। गणेश जी जीत गए तथा लौटकर अपनी जीत का समाचार माता को सुनाया। इस पर पार्वती बोलीं कि उन्हें अपने पिता को साथ लेकर आना चाहिए था। गणेशफिर भोलेनाथ की खोज करने निकल पड़े। भोलेनाथ से उनकी भेंट हरिद्वार में हुई। उस समय भोलेनाथ भगवान विष्णु व कार्तिकेय के साथ भ्रमण कर रहे थे। पार्वती से नाराज़ भोलेनाथ ने लौटने से मना कर दिया। भोलेनाथ के भक्त रावण ने गणेश के वाहन मूषक को बिल्ली का रूप धारण करके डरा दिया। मूषक गणेश जी को छोड़कर भाग गए। इधर भगवान विष्णु ने भोलेनाथ की इच्छा से पासा का रूप धारण कर लिया। गणेश जी ने माता के उदास होने की बात भोलेनाथ को कह सुनाई। इस पर भोलेनाथ बोले कि हमने नया पासा बनवाया है, अगर तुम्हारी माता पुन: खेल खेलने को सहमत हों, तो मैं वापस चल सकता हूँ।

गणेश जी के आश्वासन पर भोलेनाथ वापस पार्वती के पास पहुंचे तथा खेल खेलने को कहा। इस पर पार्वती हंस पड़ी व बोलीं- ‘अभी पास क्या चीज़ है, जिससे खेल खेला जाए।’ यह सुनकर भोलेनाथ चुप हो गए। इस पर नारद ने अपनी वीणा आदि सामग्री उन्हें दी। इस खेल में भोलेनाथ हर बार जीतने लगे। एक दो पासे फैंकने के बाद गणेश जी समझ गए तथा उन्होंने भगवान विष्णु के पासा रूप धारण करने का रहस्य माता पार्वती को बता दिया। सारी बात सुनकर पार्वती जी को क्रोध आ गया। रावण ने माता को समझाने का प्रयास किया, पर उनका क्रोध शांत नहीं हुआ तथा क्रोधवश उन्होंने भोलेनाथ को शाप दे दिया कि गंगा की धारा का बोझ उनके सिर पर रहेगा। नारद को कभी एक स्थान पर न टिकने का अभिषाप मिला। भगवान विष्णु को शाप दिया कि यही रावण तुम्हारा शत्रु होगा तथा रावण को शाप दिया कि विष्णु ही तुम्हारा विनाश करेंगे। कार्तिकेय को भी माता पार्वती ने कभी जवान न होने का शाप दे दिया।

पार्वती का वरदान

इस पर सर्वजन चिंतित हो उठे। तब नारद जी ने अपनी विनोदपूर्ण बातों से माता का क्रोध शांत किया, तो माता ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। नारद जी बोले कि आप सभी को वरदान दें, तभी मैं वरदान लूँगा। पार्वती जी सहमत हो गईं। तब शंकर ने कार्तिक शुक्ल के दिन जुए में विजयी रहने वाले को वर्ष भर विजयी बनाने का वरदान मांगा। भगवान विष्णु ने अपने प्रत्येक छोटे-बड़े कार्य में सफलता का वर मांगा, परंतु कार्तिकेय ने सदा बालक रहने का ही वर मांगा तथा कहा- ‘मुझे विषय वासना का संसर्ग न हो तथा सदा भगवत स्मरण में लीन रहूँ।’ अंत में नारद जी ने देवर्षि होने का वरदान मांगा। माता पार्वती ने रावण को समस्त वेदों की सुविस्तृत व्याख्या देते हुए सबके लिए तथास्तु कहा।

 

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