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करवा चौैथ: त्याग और पति प्रेम का प्रतीक

करवा चौैथ: त्याग और पति प्रेम का प्रतीक

छांदोग्य उपनिषद् के अनुसार चंद्रमा में पुरुष रूपी ब्रह्मा की उपासना करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इससे जीवन में किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता है। साथ ही साथ इससे लंबी और पूर्ण आयु की प्राप्ति होती है। करवा चौथ के व्रत में शिव, पार्वती, कार्तिकेय, गणोश तथा चंद्रमा का पूजन करना चाहिए। चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अघ्र्य देकर पूजा होती है। पूजा के बाद मिट्टी के करवे में चावल,उड़द की दाल, सुहाग की सामग्री रखकर सास अथवा सास के समकक्ष किसी सुहागिन के पांव छूकर सुहाग सामग्री भेंट करनी चाहिए। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार वैसे तो हर जगह के अनुसार करवा चौथ की पूजन विधि अलग-अलग होती है। इस व्रत को रखने से एक दिन पहले महिलाएं हाथों में मेंहदी रचाती हैं। ज्यादातर महिलाएं अपने घर की परंपराओं और रीति रिवाजों के अनुसार पूजा करती हैं और कहानी सुनती हैं। लेकिन आज हम आपको कुछ ऐसे काम बताने जा रहे हैं, जो करवा चौथ व्रत के दिन भूलकर भी नहीं करना चाहिएं। आज के दिन किसी भी सुहागन को बुरा-भला कहने के अलावा उसे शाप देने की गलती बिल्कुल भी नहीं करनी चाहिए।

सौंदर्य पर चार चांद लगाने के लिए गुलाबी, ताम्रवर्णी, कांस्यवर्णी रंगों का प्रयोग करें। नारंगी रंग या नारंगी शेड का प्रयोग पफैशन का नया प्रचलन है। विकल्प के तौर पर आप हल्के बैंगनी तथा गुलाबी रंगों का प्रयोग भी कर सकतेी है लेकिन यह सभ्ीा रंग अत्याध्कि चमकीले नहीं होने चाहिए। बिन्दी करवा चैथ के सौन्दर्य का अभिन्न अंग मानी जाती है। अपनी पोशाक से मिलती जुलतें रंग की सजावटी बिन्दी का प्रयोग करें। छोटे चमकीले रत्नों से जडि़त बिन्दी कापफी आर्कषक लगती है। अपने सौन्दर्य में इत्रा लगाना कभी न भूलें क्योंकि यह सोने पर सुहागें का काम करता है उचित जीवनशैली अपनाने से चहेरे पर चमक तथा उत्साह की झलक मिलती है। तेजस्वी आभा के लिए उचित पोषाहार, व्यायाम पर्याप्त नींद, तथा विश्राम अत्यन्त आवश्यक है। त्यौहार से कुछ हफ्रते पहले हल्का व्यायाम तथा पैदल चलने की आदत डालनी चाहिए। पैदल चलना शारीरिक तथा मानसिक स्वस्थ्य दोनों के लिए अत्यन्त लाभकारी साबित होता है। करवाचैथ के त्यौहार के दिन नई दुल्हनें तथा युवा महिलाएं दुल्हनों जैसी पोशाक पहनना पसन्द करती है जिससे उन्हें दुल्हन जैसा अहसास प्रदान होने का दुबारा अवसर मिलता है। आज के दौर में परम्पारिक लाल रंग के साथ-साथ गहरा गुलाबी रंग, हल्का गुलाबी रंग, हल्का नीला रंग, पिफरोजी नीला रंग, हल्का बैंगनी रंग, स्ट्राबैरी, कांस्य, जामुनी रंग भी कापफी आकर्षक तथा लोकप्रिय माने जाते है। युवा महिलाओं में दो रंगों का मिश्रण भी कापफी लोकप्रिय माना जाता है। डैªस के तौर पर लैहंगा चोली कापफी लोकप्रिय हैं या महिलाएं घने अलंकृत कुर्ते के साथ सलवार – कुर्ते का प्रयोग भी कर सकती है। साड़ी के परम्पारिक तरीके से पहनने की बजाय इस तरीके से पहनना चाहिए ताकि सजावटी चोली तथा सघन आंचल की खूबसरूती सापफ तौर पर झलकती रहे। सिली हुई साडि़यों का नया ट्रेंड चल पड़ा है जिसे आच्छादित नहीं करना पड़ता। करवाचैथ में विवाह की तरह विभिन्न आर्कषक पौशाकें पहनी जा सकती है। इस त्यौहार में जरदोजी, जाली क्रेप तथा पतली रेशमी कपड़े वाली पौशाकों को उपयोग में लाया जा सकता है। इस त्यौहार में हीरे सहित सपफेद या रंगीन रत्नों से जडि़त आभूषण प्रयोग में लाए जाते हैं। परम्परा पौशाक में आभूषण भी परम्परागत आकर्षक दिखाई देने चाहिए। लेकिन यदि आधुनिक लुक हो तो महिलाऐ प्रभावशाली आधुनिक आभूषण भी पहन सकती है। करवाचैथ में मुख्यतः परम्पारिक पोशाको तथा परिधनों को ही पसन्द किया जाता है क्योंकि इनका सम्बन्ध् व्रत तथा पूजा अर्चना से सीध्े तौर पर जुड़ा है। हालांकि बदलते आधुनिक परिवेश में पिफल्मों तथा पफैशन का प्रभाव भी कुछ हद तक इस व्रत में दिखने में मिल जाता है।

करवा

करवा मिट्टी के पात्र को कहा जाता है। इसका निर्माण काली मिट्टी में शक्कर की चौसनी मिलाकर किया जाता है। ये करवे यूं तो मिट्टी के होते हैं कहीं कहीं तांबों के करवों का पूजन भी होता है। पूजन में करीब 10 या 13 करवे रखे जाते हैं। करवों में पूजन का जल रखा जाता है। करवों का पूजन में बेहद महत्व है। इन करवों के बिना पूजन संभव नहीं है। कुछ करवों में करवों की दीवार पर नली नुमा मुंह बना होता है। जिससे महिलाओं को पूजन के दौरान चंद्र को जल समर्पित करने में आसानी हो। मौजूदा समय में करवों को आकर्षक अंदाज़ में सजाया जाता है।

करवा चौैथ की पवित्र कथा

करवा चौैथ की पवित्र कथा करवा नामक स्त्री के सतीत्व और उसके पति प्रेम की कथा को याद कर उससे प्रेरणा लेने का पर्व है। यूं तो करवा चतुर्थी की कई प्रथाऐं प्रचलित हैं मगर करवा नामक स्त्री और उसके भाईयों की कथा बेहद प्रचलित है। करवा चतुर्थी का व्रत करती है और चंद्रमा न दिखने तक भोजन नहीं करती। जब उसके भाई उसे भूखा देखते हैं तो छल से उसे चंद्रोदय का आभास करवाते हैं ऐसे में जब वह भोजन ग्रहण कर लेती है तो उसके पति की मृत्यु हो जाती है लेकिन बाद में करवा कठोर व्रत व पूजन कर अपनी छोटी भाई के माध्यम से अपने पति को जीवित करवाकर उसे फिर से प्राप्त कर लेती है। इस तरह से यह कथा पति की कुशलता के लिए पत्नी द्वारा किए जाने वाले प्रयास की प्रतीक है।

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