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नसीमुद्दीन के लिए कांग्रेस ने दरवाजे खोल दिये पर शिवपाल के लिए नो एंट्री

नसीमुद्दीन के लिए कांग्रेस ने दरवाजे खोल दिये पर शिवपाल के लिए नो एंट्री

उत्तर प्रदेश की सियासत में पिछले दिनों एक बड़ा राजनैतिक घटनाक्रम सामने आया, जब कांग्रेस ने एक नेता के लिये तो अपने दरवाजे खोल दिये, लेकिन दूसरे के लिये बंद करने में जरा भी देर नहीं लगाई। जिसके कई निहितार्थ तलाशे जा रहे हैं। बात कांग्रेस में शामिल होने वाले बसपा से निष्कासित नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी और अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव की हो रही है। ऐसा क्यों हुआ, इसको लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है।

यह जानने−समझने के लिये अतीत के कुछ पन्ने पलटना जरूरी है। 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के समय राहुल और अखिलेश की दोस्ती के बाद एक नारा बहुत उछला था, ‘यूपी को यह साथ पसंद है’ यह और बात है कि यह नतीजों में परिवर्तित नहीं हो सकी थी। मगर इसका यह मतलब नहीं है कि सब कुछ खत्म हो गया है। समाजवादी नेता अखिलेश यादव और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बीच की दोस्ती भले ही उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद परवान नहीं चढ़ पाई हो, लेकिन दोनों के बीच व्यक्तिगत संबंध अभी भी बरकरार हैं। देखना यह है कि लोकसभा चुनाव के समय यह संबंध क्या गुल खिलाते हैं लेकिन इसकी सुगबुगाहट तो दिखाई दे ही रही है। फिलहाल तो इसका खामियाजा अखिलेश के चाचा शिवपाल यादव को भुगतना पड़ रहा है।
समाजवादी पार्टी में मुलायम युग समाप्त होने और अखिलेश युग की शुरूआत के साथ ही अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव को समाजवादी सियासत से ‘दूध की मक्खी’ की तरह बाहर कर दिया था। कई बार शिवपाल को अपमानित भी होना पड़ा। शिवपाल लगातार अपने अपमान का बदला लेने की कोशिश में लगे रहे और इसके लिये रास्ते भी तलाशते रहे। ऐसे में बसपा से निष्कासित नसीमुद्दीन की तरह ही शिवपाल यादव को भी कांग्रेस से काफी आस थी, नसीमुद्दीन की तरह शिवपाल भी लगातार कांग्रेस के दरवाजे पर दस्तक दे रहे थे, परंतु कांग्रेस ने नसीमुद्दीन के लिये तो ‘दरवाजे’ खोल दिये, मगर शिवपाल के लिये यही दरवाजे बंद कर दिये गये। यह बात जब सत्ता के गलियारों से बाहर निकल कर आई तो इसकी पीछे का खेल भी लोगों को समझते देर नहीं लगी। शिवपाल के लिये कांग्रेस ने अपने दरवाजे नहीं खोले तो इसकी एकमात्र वजह शिवपाल यादव का भतीजा और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की राहुल गांधी से दोस्ती थी। जिसकी वजह से कांग्रेस ने शिवपाल से दूरी बनाये रखना ही बेहतर समझा। अगले साल लोकसभा चुनाव होने हैं। मजबूत बीजेपी को पटखनी देने के लिये कांग्रेस को सपा−बसपा को साथ लेकर चलना मजबूरी है। मगर बसपा सुप्रीमो कांग्रेस को भाव नहीं दे रही हैं तो कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी से अपनी सभी उम्मीदें लगा रखी हैं।
बात बसपा से निष्कासित पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी की कि जाये तो नसीमुद्दीन ने अपने निष्कासन के करीब एक साल बाद कांग्रेस का दामन थामा है। नसीमुद्दीन के कांग्रेस में जाने की अटकलें काफी समय से लगाई जा रही थीं। इसकी वजह थी, नसीमुद्दीन के पास अपना सियासी सफर जारी रखने के लिये कोई और रास्ता ही नहीं बचा था। कांग्रेस के अलावा समाजवादी पार्टी जरूर विकल्प बन सकती थी, लेकिन वहां आजम खान जैसे नेता पहले से ही मौजूद हैं जो नसीमुद्दीन को पसंद नहीं करते हैं।
नसीमुद्दीन तो कांग्रेस में चले गये हैं, लेकिन उनके संगी−साथी उनसे छिटक चुके हैं। उधर, कुछ कांग्रेसी नसीमुद्दीन के आने से खुश हैं तो नसीमुद्दीन की इंट्री के साथ कांग्रेस में विरोध के स्वर भी उठने लगे हैं। बसपा से निष्कासित होने के बाद नसीमुद्दीन ने समर्थकों के साथ राष्ट्रीय बहुजन मोर्चा नाम की एक नई पार्टी बनाई थी। कांग्रेस ने अखिलेश के चलते शिवपाल को तो पार्टी में शामिल नहीं किया, लेकिन जब कांग्रेस नेताओं से पूछा गया कि नसीमुद्दीन को साथ लेने से बसपा सुप्रीमो नाराज नहीं हो जायेंगी तो इससे बसपा के साथ संबंधों पर पड़ने वाले किसी भी असर को पार्टी ने नकार दिया। कांग्रेस ने कहा कि किसी के आने−जाने से पार्टी के साथ संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ता है। कांग्रेस का कहना था, लोकसभा चुनाव से पहले सभी दलों के साथ होने वाले प्रस्तावित महागठबंधन पर भी इसका कोई असर नहीं पड़ने वाला है। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि विधानसभा चुनाव के दौरान बसपा ने भी उनके कई पदाधिकारियों को अपनी पार्टी में शामिल किया था। नसीमुद्दीन के साथ जिन प्रमुख नेताओं ने कांग्रेस की सदस्यता ली है, उनमें पूर्व मंत्री ओपी सिंह, रघुनाथ प्रसाद, अनिल अवाना, वीरेंद्र व्यास, अली यूसुफ आदि शामिल हैं।
बहरहाल, बसपा में रहते हुए नसीमुद्दीन की पहचान उत्तर प्रदेश के एक बड़े मुस्लिम नेता के तौर पर होती थी। पार्टी में उनका कद भी काफी बड़ा था। उन्हें मायावती का विश्वस्त माना जाता था। यह रूतबा कांग्रेस में उन्हें शायद ही हासिल हो। इसके अलावा कांग्रेस में शामिल होने के बाद भी नसीमुद्दीन सिद्दीकी की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रहीं। सिद्दीकी ने दिल्ली में जब कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की, उसी समय लखनऊ में कांग्रेस कार्यकर्ता इसको लेकर मीडिया के सामने नाराजगी जता रहे थे। सिद्दीकी को कांग्रेस में शामिल किये जाने से नाराज पार्टी के दिग्गज नेता संजय दीक्षित का कहना था कि मनरेगा भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही कांग्रेस की मुहिम इससे कमजोर होगी। सिद्दीकी पर दयाशंकर सिंह प्रकरण में उनकी पत्नी व प्रदेश सरकार में मंत्री स्वाती सिंह और उनकी पुत्री के खिलाफ अभद्रता जैसे मामले पुलिस में दर्ज हैं। सिद्दीकी के शामिल होने से भाजपा को हमलावर होने का मुद्दा भी मिल जाएगा। सिद्दीकी 2019 में फतेहपुर सीट से अपनी दावेदारी भी ठोंक सकते हैं। हालांकि विधान परिषद में उनकी सदस्यता वर्ष 2021 तक की है।
नसीमुद्दीन बुंदेलखंड से आते हैं इसलिये वहां ज्यादा कड़ी प्रतिक्रिया हो रही है। वहीं के एक पूर्व मंत्री का कहना था कि सत्ता में रहते सिद्दीकी के कांग्रेस को कमजोर करने के कारनामों को भुलाया नहीं जा सकता। राष्ट्रीय नेतृत्व को गुमराह करके सिद्दीकी भले ही कांग्रेसी बने हों परंतु स्थानीय कार्यकर्ताओं में यह फैसला हजम हो पाना आसान नहीं है। बसपा से निकाले जाने के समय गत मई 2017 में सिद्दीकी ने जिस तरह मायावती के खिलाफ ऑडियो रिकार्डिंग सुनाते हुए आरोप लगाए थे उससे दलितों में खासी नाराजगी भी है। बसपा व कांग्रेस में गठबंधन की पैरोकारी करने वाले दलित नेता सुरेश पाल कोरी का कहना है कि सिद्दीकी को लाना कांग्रेस को ज्यादा मुफीद नहीं होगा। सिद्दीकी भले ही बसपा में मुस्लिम चेहरा रहे हों परंतु मुसलमानों में उनकी जो कुछ भी छवि थी, उसकी वजह बहन मायावती ही थीं जो हर समय मुसलमानों के हितों के लिये फिक्रमंद रहती थीं।

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