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मुख्य मार्गों की सभी बिजली लाइनें भूमिगत करने के लिए केंद्र ने दी हरी झंडी

मुख्य मार्गों की सभी बिजली लाइनें भूमिगत करने के लिए केंद्र ने दी हरी झंडी

देहरादून: केंद्र ने दून के मुख्य मार्गों की सभी बिजली लाइनें भूमिगत करने और श्रीनगर-काशीपुर 400 केवी लाइन निर्माण के लिए हरी झंडी दे दी है। दोनों ही परियोजना बेहद अहम हैं। अब एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) से औपचारिक स्वीकृति के बाद काम शुरू हो जाएगा।

शुक्रवार को दिल्ली में केंद्र सरकार की इकोनॉमिक अफेयर्स कमेटी के साथ उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीसीएल) और पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन ऑफ उत्तराखंड लिमिटेड (पिटकुल) अधिकारियों के साथ बैठक हुई। यूपीसीएल का प्रस्ताव भूमिगत लाइनों को लेकर था। इस प्रस्ताव को यूपीसीएल निदेशक मंडल और राज्य सरकार से पहले ही मंजूरी मिल चुकी है। इस काम पर करीब 500 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। 80 फीसद पैसा एडीबी से मिलेगा और शेष धनराशि यूपीसीएल अपने स्तर से खर्च करेगा। प्रबंध निदेशक  बीसीके मिश्रा ने इकोनॉमिक अफेयर्स कमेटी के समक्ष इसकी कार्ययोजना का प्रस्तुतीकरण दिया, जिसके बाद कमेटी ने सहमति जता दी। प्रबंध निदेशक ने बताया कि जल्द ही स्वीकृति पत्र भी मिल जाएगा।

आइपीडीएस में नहीं मिली थी मंजूरी 

एक साल पहले तत्कालीन केंद्रीय ऊर्जा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) पीयूष गोयल ने  इंटीग्रेटेड पावर डेवलपमेंट स्कीम (आइपीडीएस) के तहत बिजली लाइनें भूमिगत करने का प्रस्ताव भेजने के निर्देश दिए थे। यूपीसीएल ने दून के लिए 900 करोड़ की कार्ययोजना केंद्र को भेजी थी। लेकिन, केंद्र के पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन ने हाथ खड़े कर दिए थे। इस कार्ययोजना में 33 केवी और 11 केवी की सभी लाइनों व मुख्य मार्गों पर पडऩे वाली एलटी लाइनों को भी भूमिगत करना प्रस्तावित था।

भूमिगत बिजली लाइन के फायदे

-मुख्य मार्गों से बिजली पोल हट जाएंगे

-तारों के जंजाल से मुक्ति मिलेगी

-इससे यातायात व्यवस्था में सुधार होगा।

-बिजली व्यवस्था भी सुधरेगी, क्योंकि भूमिगत लाइनों में फाल्ट संभावना कम होती है।

-आंधी-तूफान से लाइनों में भी फाल्ट नहीं आएगा।

-लाइनें भूमिगत होने से बिजली चोरी और लाइन लॉस भी कम होगा।

12 साल से नहीं हुआ श्रीनगर-काशीपुर लाइन निर्माण 

400 केवी श्रीनगर-काशीपुर लाइन निर्माण के लिए वर्ष 2006-07 में लाइन निर्माण के लिए मुंबई की एक कंपनी से सर्वे कराया गया। इसमें 152.8 किलोमीटर की लाइन का प्रस्ताव बना था। लाइन निर्माण का टेंडर कोबरा कंपनी को मिला। उक्त कंपनी ने अपने स्तर से सर्वे कराया।

इसमें लाइन की लंबाई 190 किमी हो गई और 25 किमी लंबी लाइन उत्तर प्रदेश की सीमा से होकर गुजरनी थी। जबकि केंद्रीय और उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग के स्पष्ट निर्देश थे कि लाइन उत्तराखंड की सीमा में ही बनाई जाए। अक्टूबर, 2014 में कंपनी को काम शुरू करने के लिए 53 लाख रुपये का भुगतान भी कर दिया।

लाइन निर्माण मार्च, 2017 तक हर हाल में पूरा होना था, लेकिन एक पोल भी नहीं लगा। इसके चलते विश्व बैंक ने दिया पैसा वापस ले लिया था।

अब लाइन निर्माण की अनुमानित लागत  530 करोड़ से बढ़कर दोगुने से भी अधिक हो गई। पिटकुल ने इकोनॉमिक अफेयर्स कमेटी के समक्ष 1200 करोड़ रुपये का प्रस्ताव पेश किया। इसे भी कमेटी ने सहमति प्रदान कर दी है। इस लाइन के बनने से सार्वजनिक व निजी क्षेत्र की कई बिजली परियोजनाओं से बिजली ली जा सकेगी।

चल रही है जांच 

नवंबर, 2017 में पिटकुल के प्रबंध निदेशक रणवीर सिंह चौहान ने लाइन निर्माण के मामले में जांच बैठा दी थी। इसके जांच निदेशक परिचालन संजय मित्तल और निदेशक वित्त अमिताभ मैत्रा कर रहे हैं। पिटकुल कोबरा कंपनी की 106 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी भी जब्त कर चुका है।

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