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गंगा के प्रदूषित होने से जलीय जीव-जंतुओं पर पड़ रहा सीधा असर

गंगा के प्रदूषित होने से जलीय जीव-जंतुओं पर पड़ रहा सीधा असर

देहरादून: गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक गंगा नदी के करीब 2500 किलोमीटर हिस्से में से 1275 किलोमीटर भाग प्रदूषित है। इसका सीधा असर जलीय जीव-जंतुओं पर पड़ रहा है। गंगा का सबसे प्रदूषित भाग कानपुर में है। यहां करीब 44 किलोमीटर हिस्से में अत्यधिक प्रदूषण के चलते अधिकतर जलीय जीव गायब हो गए हैं।

यह चौंकाने वाला खुलासा भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ) में नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी) पर आयोजित सेमिनार किया गया। इस अवसर पर संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एसए हुसैन ने कहा कि कानपुर के अलावा उत्तर प्रदेश में नरौरा बैराज से लेकर इलाहाबाद तक करीब 450 किलोमीटर का हिस्सा भी खासा प्रदूषित है।

उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि प्रदूषण के अलावा गंगा की मुख्य धारा में पानी की कमी के चलते भी जलीय जीवों के प्राकृतिक वास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। उत्तराखंड में हरिद्वार स्थित भीमगौड़ा बैराज, उत्तर प्रदेश में नरौरा व कानपुर बैराज के चलते मुख्य धारा में प्रवाह बेहद कम हो जाता है। जबकि यह अनिवार्य रूप से कम से कम 40 फीसद तक होना चाहिए।

उन्होंने उदाहरण दिया कि कई दफा भीमगौड़ा बैराज में मुख्य धारा में पानी का प्रवाह 10-20 फीसद ही रह जाता है। हालांकि डॉ. हुसैन ने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि गंगा नदी के शेष 49 फीसद भाग में जलीय जीवों की उपस्थित के साथ ही ब्रीडिंग भी हो रही है।

668 गंगा प्रहरी बनाए

सेमिनार में डब्ल्यूआइआइ की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रुचि बडोला ने बताया कि बताया कि एनएमसीजी के तहत उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल में 668 गंगा प्रहरी नियुक्त किए गए हैं। वर्ष 2020 तक चलाए जा रहे प्रोजेक्ट में इनकी संख्या एक हजार तक हो जाएगी।

गंगा प्रहरियों को रोजगार से संबंधित विभिन्न तरह के प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं। भविष्य में गंगा स्वच्छता से संबंधित जो भी कार्य किए जाएंगे, उनमें गंगा प्रहरियों का विशेष योगदान रहेगा। ऐसे में इनके समक्ष कभी भी रोजगार का संकट पैदा नहीं होगा।

29 प्रस्तुतीकरण दिए गए

संस्थान के निदेशक डॉ. वीबी माथुर ने बताया कि एनएमसीजी के तहत आयोजित सेमिनार में चार शोध प्रस्तुत किए गए। इसके अलावा पोस्टर के माध्यम से 25 शोध कार्यों पर भी प्रस्तुतीकरण दिया गया। ये सभी शोध कार्य गंगा नदी पर केंद्रित हैं।

गंगा नदी में डॉल्फिन की संख्या 1400

भारतीय वन्यजीव संस्थान के सर्वे में डॉल्फिन की संख्या 1400 रिकॉर्ड की गई है। हालांकि अब भी यह अनुमान नहीं लगाया जा सका है कि संख्या घट रही है या बढ़ रही है। फिर भी वैज्ञानिकों ने इस संख्या को अपेक्षाकृत कम बताया है।

भारतीय वन्य जीव संस्थान में नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के तहत आयोजित सेमिनार पर इस शोध को प्रस्तुत करते हुए प्रोजेक्ट एसोसिएट गौरा चंद्र दास ने बताया कि यह सर्वे गंगा नदी में 32 साइट पर किया गया। हर एक साइट पांच किलोमीटर की थी।

लगभग हर साइट पर डॉल्फिन की उपस्थिति पाई गई। हालांकि गंगा नदी के सबसे प्रदूषित भाग कानपुर क्षेत्र में एक भी डॉल्फिन रिपोर्ट नहीं की गई। डॉल्फिन पर पहले सर्वे न होने से यह कह पाना मुश्किल है कि इनकी संख्या पर प्रदूषण व मानवीय हस्तक्षेप का क्या क्या असर पड़ रहा है।

फिर भी शोध कार्य अभी वर्ष 2019-20 तक चलेगा और तभी कुछ स्पष्ट कहा जा सकता है। इतना जरूर है कि गंगा नदी के बड़े हिस्से में प्रदूषण, अवैध शिकार, शहरीकरण, बैराज आदि के चलते इनका प्राकृतिक वासस्थल घट रहे हैं।

पक्षियों की 112 प्रजातियां मिली

प्रोजेक्ट एसोसिएट गौरा चंद्र दास ने बताया कि गंगा नदी क्षेत्र में पक्षियों की 112 प्रजातियां रिकॉर्ड की गईं। उन्होंने बताया कि विभिन्न शोध पत्रों व अध्ययन के अनुसार इस क्षेत्र में पक्षी प्रजातियों की संख्या 140 आंकी गई है। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि बदलते परिवेश में यह संख्या घटी है। गायब होने वाले पक्षियों में प्रवासियों की संख्या अधिक है।

ये प्रजातियां नहीं मिली

नॉर्दन पिंटेल, मलार्ड, यूरेशियन विजन, बारहेडेड गीज, नॉर्दन शेवेलर, गार्गेनी, ब्लैक टेल्ड गॉडविड, प्लास गर्ल, ब्राउन हेडेड गर्ल आदि।

गंगा के पानी में प्रतिबंधित कीटनाशकों की मात्रा मिली

गंगा के पारिस्थितिक तंत्र के लिए कीटनाशक भी खतरा बने हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान के अध्यन में गंगा नदी में प्रतिबंधित श्रेणी के कीटनाशकों की मात्रा भी पाई गई है। सेमिनार में संस्थान की प्रोजेक्ट एसोसिएट रुचिका साह ने अपने शोध को प्रस्तुत करते हुए कहा कि जिन कीटनाशकों (पेस्टीसाइड्स) को प्रतिबंधित किया जा चुका है, उनकी मात्रा भी गंगा नदी के पानी व मछलियों की कोशिकाओं में पाई गई है।

कीटनाशकों की स्थिति का पता करने के लिए गंगा नदी में उत्तरकाशी के हर्षिल से लेकर पश्चिम बंगाल तक सैंपल लिए गए। जांच में पता चला कि 33 फीसद सैंपल में ऑर्गेनोफॉसफेट्स की मात्रा पाई गई। जबकि 30 फीसद में हेप्टाक्लॉर इपॉक्साइड मिला। उत्तराखंड में यह कीटनाशक ऋषिकेश के पास ब्यास घाट के सैंपल में कम मात्रा में पाया गया।

रुचिका साह ने बताया कि शोध अभी चल रहा है, वर्ष 2019-20 तक स्पष्ट हो पाएगा कि गंगा के पानी में मिले इन कीटनाशकों का जलीय जीवों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। साइट की बात करें तो पश्चिम बंगाल के हशीमपुर में व उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर क्षेत्र में कीटनाशकों की मात्रा सबसे अधिक पाई गई।

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