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उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल, न पर्याप्त संख्या में डॉक्टर न ही संसाधन

उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल, न पर्याप्त संख्या में डॉक्टर न ही संसाधन

देहरादून: सूबे में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल किसी से छिपा नहीं है। जिन सरकारी अस्पतालों पर आम जनता के स्वास्थ्य का जिम्मा है उनमें न तो पर्याप्त डाक्टर हैं और न ही संसाधन। अब तक भी सरकारें इस मर्ज का इलाज नहीं ढूंढ पाई है। नई सरकार के सामने भी यह चुनौती मजबूती से खड़ी है। इस बीच कुछ नए डॉक्टरों की भर्ती जरूर हुई, पर मंजिल अभी भी बहुत दूर है।

प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं की बेहतरी के लिए बीते सालों में नीतियां तो बनी, मगर धरातल पर उतरी नहीं। यही वजह है कि इतने साल बाद भी सरकारी अस्पतालों में स्वीकृत पदों के अनुरूप न ही डॉक्टरों की तैनाती हुई और न ही अन्य स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता। हैरान करने वाली बात यह कि 13 जनपदों में स्थित सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों के कुल 2715 स्वीकृत पदों के सापेक्ष 1547 पर ही डॉक्टर तैनात हैं। इनमें भी विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है।

इस बीच नई नियुक्तियां की गई पर आंकड़े इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि यह मर्ज जल्दी मिटने वाला नहीं है। हाल में 425 नए चिकित्सक नियुक्ति किए गए, पर इनमें ज्वाइन महज 353 ने ही किया। अब यदि विशेषज्ञ के लिहाज से इसका आकलन किया जाए तो 60 में से मात्र 29 चिकित्सकों ने ज्वाइन किया है। डॉक्टरों की गिनती जरूरी बढ़ी है, पर इनमें एक बड़ी संख्या दंत चिकित्सकों की भी है, जिन्हें एलोपैथिक डॉक्टरों के पदों के सापेक्ष तैनाती दी गई है। बाकी कसर प्रशासनिक पदों पर विराजमान डॉक्टर पूरी कर रहे हैं।

राज्य में विशेषज्ञों की कमी है, पर कई विशेषज्ञ चिकित्सक आज भी अस्पताल छोड़ प्रशासनिक पदों पर काबिज हैं। उस पर एनएचएम व हेल्थ सिस्टम प्रोजेक्ट से कई डॉक्टर संबद्ध कर दिए गए हैं। जिसने स्थिति को और भी भयावह बना दिया है। इस गैप को कुछ हद तक संविदा चिकित्सकों के सहारे भरा गया है।

उधर, एक बात और है आम आदमी तक के मन में खटक रही है। खुद अस्पतालों की दशा सुधारने के बजाए सरकार इन्हें निजी हाथों में सौंप रही है। जिसकी शुरुआत डोईवाला और टिहरी के अस्पतालों से हो चुकी है। निजी सेक्टर से सरकार का यह प्रेम इसलिए  भी गले नहीं उतर रहा क्योंकि पीपीपी मोड ने इससे पहले भी सरकार की खासी किरकिरी कराई है।

मेडिकल कॉलेजों में भी फैकल्टी की कमी 

मेडिकल कॉलेज मानव संसाधन के लिहाज से फीडर का काम करते हैं, लेकिन राज्य के तीन सरकारी मेडिकल कालेजों की तबीयत भी नासाज है। चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधीन इन मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी की खासी कमी है। इसकी बानगी देखनी है तो दून मेडिकल कॉलेज का ही हाल देख लीजिए। वहां ऑपरेशन से लेकर अल्ट्रासाउंड तक आज इस कारण प्रभावित हैं क्योंकि न एनेस्थेसिस्ट पर्याप्त हैं और न रेडियोलॉजिस्ट। अन्य विभाग का भी हाल यही है। जिसका खामियाजा मरीज भुगत रहे हैं।

सभी सरकारी अस्पतालों में सीसी कैमरे लगाएं

हाईकोर्ट ने राज्य के सभी सरकारी अस्पतालों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के आदेश दिए हैं। साथ ही सरकार से अस्पतालों में डाक्टरों व अन्य कर्मचारियों के खाली पदों का ब्योरा तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई के लिए 25 सितंबर की तारीख नियत की है।

हल्द्वानी निवासी नरेश मैंदोला ने इस संबंध में जनहित याचिका दाखिल की थी। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि हल्द्वानी स्थित सुशीला तिवारी मेडिकल कालेज में पिछले तीन हफ्ते के अंतराल में नौ बच्चों की मौत हो गयी थी। इन बच्चों की मौत डाक्टरों की कमी के कारण समुचित इलाज न मिलने के कारण होना सामने आया है। याचिका में अस्पतालों की व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाए गए।

हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीके बिष्ट व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने बुधवार को याचिका पर सुनवाई की। दलीलें सुनने के बाद पीठ ने कहा कि प्रदेश के सभी सरकारी अस्पतालों की इमरजेंसी, ओपीडी और पंजीकरण कक्षों सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं। अस्पतालों में डाक्टरों और अन्य स्टाफ की कमी को भी हाईकोर्ट की खंडपीठ ने गंभीरता से लिया है। पीठ ने सरकार से पूछा है कि वर्तमान में डाक्टरों व अन्य कर्मचारियों के कितने पद खाली हैं, ये कब से खाली चल रहे हैं। इतना ही नहीं, सरकार से यह भी बताने को कहा है कि खाली पदों को भरने के लिए उसके स्तर पर क्या-क्या प्रयास किए गए। अदालत ने सरकार ने यह सभी जानकारियां दो सप्ताह के भीतर शपथ पत्र पर देने के आदेश दिए हैं।

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