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नीतीश कुमार और शरद यादव की राह हुई एक-दूसरे से अलग

नीतीश कुमार और शरद यादव की राह हुई एक-दूसरे से अलग

नई दिल्ली ।  जदयू पर कब्जे की लड़ाई में बागी शरद यादव गुट को चुनाव आयोग से करारा झटका लगा है। चुनाव आयोग ने अपने फैसले में कहा कि शरद यादव कैंप पार्टी पर पुख्ता दावेदारी के मामले में अपने पक्ष को सही ढंग से नहीं रख सका। ये बात अब साफ है कि पार्टी पर वर्चस्व की लड़ाई में नीतीश खेमे ने बाजी मार ली है। चुनाव आयोग के फैसले पर शरद यादव ने कहा कि यह एक संघर्ष है, जिसमें अंतिम विजय उनकी होगी। शरद यादव के तेवर से साफ है कि वो अपनी लड़ाई को और आगे बढ़ाएंगे। जदयू के अंदर जो तूफान है उसे समझने के लिए शरद यादव और नीतीश कुमार के संबंधों के साथ-साथ सामाजिक न्याय के आंदोलन को बारीकी से देखना होगा।

समाजवादी कुनबे की कहानी

आज से करीब 28 साल पहले 1989 में भ्रष्टाचार के खिलाफ राजीव गांधी की सरकार बैकफुट पर थी। कांग्रेस के विरोध में समाजवादी नेताओं ने एक नए मोर्चे का गठन किया, जिसे जनता दल के नाम से जाना गया। ये बात अलग है कि जनता दल ने जिस चेहरे का चुनाव किया वो कांग्रेस के बागी नेता वीपी सिंह थे। 1989 के आम चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ इतनी तेज लहर थी कि राजीव गांधी सत्ता से बाहर हो गए। लोगों ने वीपी सिंह में भरोसा किया लेकिन वीपी सिंह की सरकार बहुमत के जादुई आंकड़ों से काफी दूर थी। देश की राजनीति में एक नए प्रयोग का दौर शुरू हुआ।

कांग्रेस के खिलाफ वाम दलों और भाजपा (दोनों दलों की विचारधारा एक-दूसरे से बिल्कुल जुदा) ने बाहर से वीपी सिंह सरकार को समर्थन दिया और देश में गैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। लेकिन ये सरकार अंतर्विरोधों के चलते अपने कार्यकाल को पूरा नहीं कर सकी। दरअसल इसके पीछे एक बड़ी वजह ये थी कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू किए जाने के विरोध में भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया और वीपी सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई। इस तरह से बदले हुए घटनाक्रम में चंद्रशेखर की सरकार सत्ता पर काबिज हुई ये बात अलग थी कि जिस कांग्रेस का समाजवादी धड़ा विरोध कर रहा था, उनके समर्थन से चंद्रशेखर ने सरकार बनायी। लेकिन चंद्रशेखर की सरकार भी नहीं चल सकी।

चंद्रशेखर सरकार के पतन के बाद सामाजिक न्याय के पुरोधा बन चुके नेताओं ने अपनी अलग-अलग राह चुनी, जिसमें मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, शरद यादव और नीतीश कुमार प्रमुख थे। बिहार में लालू प्रसाद के विरोध में नीतीश कुमार ने समता पार्टी का गठन किया। लेकिन कुछ वर्षों के बाद समता पार्टी का दोबारा जन्म जदयू के रूप में हुआ, जिसके संस्थापक सदस्यों में शरद यादव शामिल थे।

जानकार की राय

Jagran.Com से खास बातचीत में जदयू नेता अजय आलोक ने कहा कि पार्टी ने अपनी विचारधारा के साथ कभी समझौता नहीं किया। शरद यादव के आरोपों में दम नहीं है। जदयू पूरी तरह लोकतांत्रिक पार्टी है, जहां अलग-अलग विचारों का सम्मान होता है। किसी भी फैसले के लिए पार्टी में समितियां बनी हुई हैं, लिहाजा अगर कोई ये कहे कि कोई एक शख्स फैसला लेता है तो वो पूरी तरह गलत है।

‘सुविधा और जरूरत की राजनीति’

सुविधा और जरूरत के मुताबिक जदयू के नेता अपनी राजनीति को आगे बढ़ाते रहे। जदयू के नेताओं को भाजपा कभी अछूत नजर आती थी, तो कभी भाजपा में देश का उद्धार नजर आता था। ये बात अलग थी कि जदयू के बहुत से नेता नीतीश कुमार के फैसलों का दबीजुबान विरोध करते थे। लेकिन विरोध के उन सुरों का कोई खास मतलब नहीं था।

बिहार के सीएम नीतीश कुमार और शरद यादव के बीच मतभेद का दौर राष्ट्रपति चुनावों के साथ ही शुरू हो गया। एनडीए द्वारा रामनाथ कोविंद को प्रत्याशी घोषित किए जाने के बाद, कांग्रेस की अगुवाई में करीब 18 दलों के गठबंधन ने साझा उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया। लेकिन बिहार के सीएम और जदयू अध्यक्ष नीतीश कुमार ने रामनाथ कोविंद को समर्थन देने का ऐलान किया, जिसके बाद पार्टी के अंदर खींचतान शुरू हो गयी। इसके साथ-साथ भ्रष्टाचार के मुद्दे पर नीतीश कुमार और लालू के रिश्तों में तल्खी आ रही थी।

बिहार के डिप्टी सीएम रहे तेजस्वी यादव पर नीतीश कुमार कहते रहे कि अगर वो पाक साफ हैं तो उन्हें अपने पक्ष को रखने में किस तरह की दिक्कत आ रही है? हालांकि जदयू और राजद के बीच रिश्ते इतने खट्टे हो गए कि नीतीश कुमार ने कहा कि अब उनके लिए इस तरह से सरकार चलाना संभव नहीं है और महागठबंधन, इतिहास का एक हिस्सा बन गया।

नीतीश कुमार एक बार फिर अपने पुराने सहयोगी भाजपा के संग हो चले, जिससे वो 2014 के आम चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के नाम पर अपना रिश्ता तोड़ चुके थे। इन बदली परिस्थितियों में शरद यादव खुलकर विरोध में आ गए और वो कहने लगे कि सुविधाजनक राजनीति से बेहतर है कि सिद्धांत की राजनीति पर आगे बढ़ा जाए। शरद यादव ने साफ कहा कि वो अगस्त के महीने में लालू यादव की रैली में शामिल होंगे। लेकिन जदयू ने साफ कर दिया था कि अगर वो राजद की रैली में हिस्सा लेते हैं तो उसे पार्टी विरोधी कार्यों के रूप में देखा जाएगा। शरद के इन तेवरों से साफ हो गया कि अब वो नीतीश कुमार के खिलाफ आर पार की लड़ाई लड़ेंगे। लेकिन चुनाव आयोग के फैसले के बाद नीतीश कुमार के खिलाफ वो पहली लड़ाई हार चुके हैं।

चुनाव आयोग से शरद कैंप को झटका

चुनाव आयोग की तरफ से पत्र भेजकर यह कहा गया कि शरद यादव कैंप की तरफ से दावे को लेकर सांसद या विधायकों के समर्थन का किसी तरह का कोई सबूत या एफिडेविट पेश नहीं किया गया। इसके अलावा, शरद यादव के बागी गुट की तरफ से जो आवेदन जावेद रज़ा की तरफ से दिया गया था उस पर रज़ा का हस्ताक्षर नहीं था। चुनाव आयोग ने अपने आदेश में कहा, “यही वजह है कि चुनाव आयोग ने सिंबल ऑर्डर के पैरा 15 के तहत उस आवेदन पर किसी तरह का कोई संज्ञान नहीं लिया।”

जब शरद यादव ने कहा- यह एक संघर्ष और जंग है

चुनाव आयोग की ओर से पार्टी का प्रतीक चिन्ह न मिलने पर जदयू के वरिष्ठ नेता शरद यादव ने कहा कि यह एक संघर्ष और जंग है जिसे मैं जीतूंगा। चुनाव आयोग ने मंगलवार को सबूतों के अभाव में शरद यादव के उस दावे को खारिज कर दिया है जिसमें जदयू का पार्टी सिंबल उन्हें देने के लिए आवेदन दिया गया था।

शरद यादव द्वारा दायर की गयी याचिका के विरोध में नीतीश खेमे ने भी चुनाव आयोग में अर्जी दायर की थी। जदयू ने यह भी कहा है कि शरद यादव ने अपनी मर्जी से पार्टी का साथ छोड़ा है व पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त हैं। इसके विरोध में याचिका दायर करने वाले प्रतिनिधिमंडल में आरसीपी सिंह, संजय झा, ललन सिंह व केसी त्यागी हैं।

शरद यादव ने नीतीश को बताया था धोखेबाज

गौरतलब है कि जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटने के बाद राजनीति के हाशिए पर रहे शरद यादव उस वक्त अचानक सुर्खियों में आ गए जब उन्होंने नीतीश कुमार के बिहार में महागठबंधन का साथ छोड़ने और भाजपा के हाथ मिलाने का पुरजोर विरोध किया। शरद यादव ने कहा कि नीतीश कुमार ने जो किया है वह बिहार की जनता के साथ धोखा है, क्योंकि चुनाव महागठबंधन के नाम पर लड़ा गया था।

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